Ras– रस की परिभाषा, भेद और उदाहरण, हिन्दी व्याकरण – Ras in Hindi

रस काव्य का वह महत्वपूर्ण तत्व है जिसके माध्यम से पाठक या श्रोता को आनंद और भावानुभूति की प्राप्ति होती है। इस लेख में रस क्या है, रस की परिभाषा, रस सिद्धांत तथा हिंदी साहित्य में प्रचलित रसों का विस्तृत वर्णन किया गया है। साथ ही, Ras in Hindi के सभी ग्यारह भेदों और उनकी विशेषताओं को सरल एवं स्पष्ट भाषा में समझाया गया है।

Ras (रस)- रस क्या होते हैं? रस की परिभाषा

रस : परिभाषा, अर्थ एवं महत्व

रस का शाब्दिक अर्थ ‘आनंद’ होता है। काव्य का अध्ययन, श्रवण या अवलोकन करते समय पाठक अथवा श्रोता को जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है, उसे रस कहा जाता है। Hindi Vyakaran और काव्यशास्त्र में रस का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। जिस प्रकार आत्मा के बिना शरीर का अस्तित्व अधूरा है, उसी प्रकार रस के अभाव में कोई भी रचना प्रभावशाली काव्य नहीं कहलाती। इसी कारण रस को ‘काव्य की आत्मा’ तथा ‘प्राण तत्व’ कहा जाता है। छंद और अलंकार के साथ रस भी काव्य के प्रमुख एवं अनिवार्य तत्वों में से एक है।

रस शब्द की व्युत्पत्ति

Ras in Hindi का मूल संस्कृत की ‘रस्’ धातु से माना जाता है, जिसमें ‘अच्’ प्रत्यय के योग से ‘रस’ शब्द की रचना हुई है। इसका अर्थ है— ऐसी अनुभूति या स्वाद, जो आनंद प्रदान करे। सरल शब्दों में, किसी काव्य, नाटक या साहित्यिक रचना को पढ़ने, सुनने अथवा देखने से जो सुखद अनुभूति प्राप्त होती है, वही रस कहलाती है।

रस की व्युत्पत्ति से संबंधित दो प्रसिद्ध सूत्र इस प्रकार हैं—

“रस्यते आस्वाद्यते इति रसः” अर्थात् जिसका आस्वादन किया जाए, वह रस है।

“सरते इति रसः” अर्थात् जो प्रवाहित होता है, उसे रस कहा जाता है।

इन दोनों सूत्रों से स्पष्ट होता है कि रस के दो प्रमुख गुण हैं— आस्वादन (स्वाद) और द्रवत्व (प्रवाहशीलता)। वैदिक एवं उपनिषदकालीन साहित्य में भी रस का प्रयोग आनंद, मधुरता और द्रव स्वरूप के अर्थों में किया गया है।

काव्य में रस का स्वरूप

श्रव्य काव्य को सुनने या पढ़ने तथा दृश्य काव्य को देखने और सुनने से जो दिव्य एवं अलौकिक आनंद प्राप्त होता है, वही काव्य का रस कहलाता है। किसी रस की अनुभूति उसके स्थायी भाव के आधार पर होती है। पाठक या श्रोता के हृदय में विद्यमान स्थायी भाव जब विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से जागृत होता है, तब वह रस के रूप में परिणत होकर सौंदर्य एवं आनंद की अनुभूति कराता है।

इस प्रकार Ras in Hindi केवल साहित्यिक आनंद का माध्यम ही नहीं है, बल्कि वह तत्व है जो काव्य को जीवंत, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी बनाता है।

भरतमुनि के अनुसार रस की परिभाषा

रस सिद्धांत का सर्वप्रथम व्यवस्थित प्रतिपादन महर्षि भरतमुनि ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ में किया था। उन्हें भारतीय काव्यशास्त्र में रस सिद्धांत का प्रवर्तक माना जाता है। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में आठ प्रमुख रसों का वर्णन करते हुए बताया कि रस विभिन्न नाट्य तत्वों के समन्वय से उत्पन्न होने वाली भावात्मक एवं कलात्मक अनुभूति है। उनके अनुसार भाव स्वयं रस नहीं है, बल्कि रस की उत्पत्ति का आधार है। हालांकि उन्होंने स्थायी भावों को ही रस का स्वरूप माना है।

Ras in Hindi की व्याख्या करते हुए भरतमुनि ने प्रसिद्ध रस-सूत्र प्रस्तुत किया है—

“विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः”

अर्थात विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी (संचारी) भावों के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है। यही सूत्र भारतीय रस सिद्धांत का मूल आधार माना जाता है।

नाट्यशास्त्र में वर्णित रस

भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में आठ रसों का उल्लेख किया है—

  • श्रृंगार रस
  • हास्य रस
  • करुण रस
  • रौद्र रस
  • वीर रस
  • भयानक रस
  • वीभत्स रस
  • अद्भुत रस

यद्यपि उन्होंने शांत रस को स्वतंत्र रूप से नाट्य प्रयोग के लिए उपयुक्त नहीं माना, फिर भी उसे रस के रूप में स्वीकार किया। बाद में शांत रस के समावेश से नवरस की अवधारणा विकसित हुई, जिसमें कुल नौ रस माने गए। नाट्यशास्त्र में वात्सल्य रस का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, जबकि भक्ति रस को भरतमुनि ने स्वतंत्र रस न मानकर एक भाव के रूप में स्वीकार किया है।

अन्य विद्वानों के अनुसार रस की परिभाषा

आचार्य अभिनवगुप्त

आचार्य अभिनवगुप्त ने भरतमुनि के रस सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या करते हुए रस को केवल विषय तक सीमित न रखकर सहृदय दर्शक या पाठक की अनुभूति से जोड़ा। उनके अनुसार रस कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि वह आनंदमयी चेतना है जो व्यक्ति को किसी कलात्मक अनुभव के साथ एकाकार होने पर प्राप्त होती है। उन्होंने रस को “आस्वाद्य” अर्थात अनुभव और आनंद लेने योग्य माना है।

आचार्य विश्वनाथ

रस के स्वरूप का अत्यंत व्यापक विवेचन आचार्य विश्वनाथ ने अपने ग्रंथ साहित्यदर्पण में किया है। उनके अनुसार जब हृदय में स्थित स्थायी भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से जागृत होता है, तब वह रस का रूप धारण कर लेता है।

उन्होंने लिखा है—

“विभावेनानुभावेन व्यक्तः संचारिणा तथा।
रसतामेति रत्यादिः स्थायिभावः सचेतसाम्॥”

अर्थात सहृदय व्यक्तियों के हृदय में स्थित स्थायी भाव विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के संयोग से रस के रूप में परिणत हो जाता है।

आचार्य मम्मट

आचार्य मम्मट के अनुसार, विभाव, अनुभाव और अन्य सहायक भावों के संयोग से उत्पन्न होने वाली आनंदमयी चित्तवृत्ति को रस कहा जाता है।

आचार्य धनंजय

आचार्य धनंजय के अनुसार, विभाव, अनुभाव, सात्त्विक भाव तथा व्यभिचारी भावों के सहयोग से आस्वादित स्थायी भाव ही रस कहलाता है।

डॉ. विश्वम्भर नाथ

डॉ. विश्वम्भर नाथ ने रस को भावों के छंदात्मक एवं कलात्मक समन्वय का परिणाम माना है। उनके अनुसार भावों का संतुलित संयोजन ही रस की सृष्टि करता है।

आचार्य श्यामसुंदर दास

आचार्य श्यामसुंदर दास के अनुसार, जब स्थायी भाव विभाव, अनुभाव एवं संचारी भावों के संयोग से आस्वादन योग्य बन जाता है, तब सहृदय पाठक या दर्शक उसके रस का अनुभव करता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रस की अत्यंत सुंदर व्याख्या करते हुए कहा है कि जिस प्रकार आत्मा की मुक्त अवस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्त एवं आनंदपूर्ण अवस्था रस-दशा कहलाती है।

इस प्रकार विभिन्न आचार्यों द्वारा दी गई परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि Ras in Hindi केवल साहित्यिक आनंद का माध्यम नहीं है, बल्कि वह अनुभूति है जो पाठक, श्रोता अथवा दर्शक को काव्य और नाट्य के माध्यम से गहन भावलोक में प्रवेश कराती है।

रस की विशेषताएँ

रस की विभिन्न परिभाषाओं और विद्वानों द्वारा किए गए विवेचन के आधार पर इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

  • रस एक आस्वादात्मक अनुभूति है, जिसका सहृदय पाठक, श्रोता या दर्शक आनंदपूर्वक अनुभव करता है।
  • रस की अनुभूति अखंड और निर्विघ्न होती है, अर्थात इसके आस्वादन के समय मन पूर्णतः उसी भाव में निमग्न रहता है।
  • रस चिन्मय, स्वप्रकाश एवं आनंदमय होता है, जो व्यक्ति के अंतर्मन को विशेष प्रकार की तृप्ति प्रदान करता है।
  • रस का अनुभव करते समय अन्य किसी प्रकार के ज्ञान या विचार का प्रभाव नहीं रहता, जिससे व्यक्ति पूर्णतः भावलोक में प्रवेश कर जाता है।
  • रस में एक अलौकिक चमत्कारिक शक्ति होती है, जो सामान्य अनुभवों से परे जाकर विशेष आनंद की अनुभूति कराती है।
  • काव्य के पठन एवं श्रवण तथा नाटक के दर्शन और श्रवण से सहृदय व्यक्ति को रसानंद की प्राप्ति होती है।
  • रस को ‘ब्रह्मानंद सहोदर’ कहा गया है, क्योंकि इसकी अनुभूति आध्यात्मिक आनंद के समान मानी जाती है।
  • Ras in Hindi साहित्य और नाट्यकला का वह तत्व है, जो रचना को प्रभावशाली, हृदयस्पर्शी और सौंदर्यपूर्ण बनाता है।

रस के अंग (अवयव)

रस की निष्पत्ति चार प्रमुख अंगों या अवयवों के संयोग से होती है। ये निम्नलिखित हैं—

  1. स्थायी भाव – हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान मूल भाव।
  2. विभाव – वे कारण या परिस्थितियाँ जो स्थायी भाव को जागृत करती हैं।
  3. अनुभाव – भावों की बाह्य अभिव्यक्ति, जो हाव-भाव एवं क्रियाओं के माध्यम से प्रकट होती है।
  4. संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) – वे अस्थायी भाव जो स्थायी भाव को पुष्ट एवं प्रभावशाली बनाने में सहायता करते हैं।

इन चारों तत्वों के समन्वय से रस की उत्पत्ति होती है और पाठक या दर्शक को सौंदर्य एवं आनंद की अनुभूति प्राप्त होती है।

1. रस का स्थायी भाव

स्थायी भाव का अर्थ है मुख्य या प्रधान भाव। यह वह मूल भाव होता है जो व्यक्ति के हृदय में स्थायी रूप से विद्यमान रहता है और उचित परिस्थितियाँ मिलने पर जागृत होकर रस का रूप धारण कर लेता है। Hindi Grammar में स्थायी भाव को रस की उत्पत्ति का आधार माना गया है। सामान्यतः ये भाव मन में सुप्त अवस्था में रहते हैं, लेकिन विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के प्रभाव से पुष्ट होकर रस की निष्पत्ति करते हैं।

काव्य और नाट्यशास्त्र में किसी भी रस का आधार उसका स्थायी भाव माना जाता है। किसी रचना में आरंभ से अंत तक एक प्रमुख भाव विद्यमान रहता है, जिसे उस रस का स्थायी भाव कहा जाता है। इसी कारण स्थायी भाव को रस का मूल तत्व माना गया है।

भारतीय काव्यशास्त्र में प्रारंभिक रूप से नौ स्थायी भाव स्वीकार किए गए हैं, जिनके आधार पर नौ रसों अर्थात नवरस की कल्पना की गई है। प्रत्येक रस के मूल में एक विशिष्ट स्थायी भाव निहित रहता है। उदाहरण के लिए, श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति तथा वीर रस का स्थायी भाव उत्साह होता है।

बाद के आचार्यों ने ‘वात्सल्य’ तथा ‘देवविषयक रति (भक्ति)’ को भी स्थायी भाव के रूप में मान्यता प्रदान की। इसके परिणामस्वरूप स्थायी भावों की संख्या बढ़कर ग्यारह हो गई और उसी के अनुरूप रसों की संख्या भी 11 मानी जाने लगी।

इस प्रकार Ras in Hindi के अध्ययन में स्थायी भाव का विशेष महत्व है, क्योंकि यही रस की उत्पत्ति का आधार और उसकी आत्मा माना जाता है।

स्थायी भावों की सूची एवं परिभाषाएँ (Ras in Hindi)

स्थायी भावरस (Ras in Hindi)स्थायी भाव की परिभाषा एवं अर्थ
रतिश्रृंगार रसस्त्री और पुरुष के बीच उत्पन्न प्रेम, स्नेह एवं आकर्षण की भावनात्मक चित्तवृत्ति को रति कहा जाता है।
हासहास्य रसकिसी व्यक्ति की वाणी, रूप, हाव-भाव या विचित्र व्यवहार को देखकर मन में उत्पन्न प्रसन्नता और हँसी की भावना हास कहलाती है।
क्रोधरौद्र रसअपमान, अन्याय, विवाद या गंभीर अपराध के कारण मन में उत्पन्न उग्र मनोविकार को क्रोध कहते हैं।
शोककरुण रसप्रिय व्यक्ति, वस्तु, वैभव या किसी महत्वपूर्ण वस्तु के वियोग अथवा नाश से उत्पन्न मानसिक व्यथा को शोक कहा जाता है।
उत्साहवीर रसमन की वह प्रेरणादायक और उल्लासपूर्ण अवस्था, जो व्यक्ति को साहस, पराक्रम और दृढ़ता के साथ कार्य करने के लिए प्रेरित करे, उत्साह कहलाती है।
आश्चर्य / विस्मयअद्भुत रसकिसी असामान्य, अलौकिक या अनोखी घटना, वस्तु अथवा दृश्य को देखकर उत्पन्न होने वाला विस्मय आश्चर्य कहलाता है।
जुगुप्सा / घृणावीभत्स रसकिसी घृणित, अरुचिकर या अप्रिय वस्तु, दृश्य या परिस्थिति को देखकर मन में उत्पन्न घृणा का भाव जुगुप्सा कहलाता है।
भयभयानक रसकिसी संकट, हिंसक जीव, भयंकर दृश्य, अपराध या डरावनी परिस्थिति के कारण उत्पन्न मानसिक व्याकुलता को भय कहा जाता है।
निर्वेदशांत रससांसारिक विषयों, भोग-विलास और मोह-माया से उत्पन्न वैराग्य की भावना निर्वेद कहलाती है।
वत्सलतावात्सल्य रसमाता-पिता का संतान के प्रति अथवा परिवारजनों का एक-दूसरे के प्रति निष्कपट, स्नेहमय और सात्त्विक प्रेम वत्सलता कहलाता है।
देवविषयक रति / भगवद् अनुरागभक्ति रसईश्वर के प्रति अटूट प्रेम, श्रद्धा, समर्पण और गहन अनुरक्ति को देवविषयक रति या भक्ति भाव कहा जाता है।

वत्सलता और देवविषयक रति (भक्ति) को कुछ आचार्यों ने स्वतंत्र स्थायी भाव के रूप में स्वीकार किया है, जबकि कई विद्वान इन्हें श्रृंगार रस की व्यापक परिधि में ही सम्मिलित मानते हैं। इसी कारण कुछ ग्रंथों में रसों की संख्या नौ तथा कुछ में ग्यारह बताई गई है।

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रस-निष्पत्ति में स्थायी भाव का महत्व

रस की उत्पत्ति में स्थायी भाव की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। स्थायी भाव ही विभाव, अनुभाव और संचारी भावों के सहयोग से परिपक्व होकर रस का स्वरूप धारण करता है। दूसरे शब्दों में, रस स्थायी भाव का विकसित और परिष्कृत रूप है।

काव्य या नाटक में उपस्थित अन्य सभी भाव एवं तत्व स्थायी भाव को पुष्ट, प्रभावशाली और सजीव बनाने का कार्य करते हैं। इसलिए Ras in Hindi के अध्ययन में स्थायी भाव को रस का आधार, केंद्रबिंदु और सबसे महत्वपूर्ण अवयव माना जाता है।

2. रस का विभाव

रस सिद्धांत में विभाव उन कारणों, व्यक्तियों, वस्तुओं या परिस्थितियों को कहा जाता है जो किसी व्यक्ति के हृदय में विद्यमान स्थायी भाव को जागृत और उद्दीप्त करते हैं। दूसरे शब्दों में, जिन तत्वों के कारण भावों की अभिव्यक्ति होती है और रस की उत्पत्ति संभव होती है, उन्हें विभाव कहा जाता है। रस की निष्पत्ति में विभाव का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि यही स्थायी भावों को सक्रिय करने का कार्य करते हैं।

विभाव के भेद

स्थायी भावों को जागृत एवं प्रबल बनाने के आधार पर विभाव के दो प्रमुख भेद माने गए हैं—

  1. आलंबन विभाव
  2. उद्दीपन विभाव

(1) आलंबन विभाव

जिस व्यक्ति, वस्तु या विषय के कारण किसी भाव का उदय होता है, उसे उस भाव का आलंबन विभाव कहा जाता है। उदाहरण के लिए, नायक और नायिका के बीच उत्पन्न प्रेम में दोनों एक-दूसरे के आलंबन विभाव होते हैं।

आलंबन विभाव के दो पक्ष होते हैं—

  • आश्रयालंबन – जिसके हृदय में भाव उत्पन्न होता है।
  • विषयालंबन – जिसके प्रति या जिसके कारण भाव उत्पन्न होता है।

उदाहरण: यदि भगवान राम के हृदय में सीता के प्रति प्रेम (रति) का भाव उत्पन्न होता है, तो राम आश्रयालंबन और सीता विषयालंबन कहलाएँगी।

(2) उद्दीपन विभाव

वे वस्तुएँ, दृश्य, वातावरण या परिस्थितियाँ जो जागृत स्थायी भाव को और अधिक तीव्र तथा प्रभावशाली बनाती हैं, उद्दीपन विभाव कहलाती हैं।

उदाहरण: चाँदनी रात, कोयल का मधुर स्वर, रमणीय उद्यान, एकांत स्थान, नायक-नायिका की आकर्षक चेष्टाएँ आदि।

आलंबन विभाव स्थायी भाव को जन्म देता है, जबकि उद्दीपन विभाव उसी भाव को और अधिक प्रबल, जागृत तथा उत्कट बनाता है।

रस-निष्पत्ति में विभाव का महत्व

मन में निहित स्थायी भावों को जागृत करने और उन्हें तीव्र बनाने का कार्य विभाव द्वारा किया जाता है। जब ये स्थायी भाव विभावों के प्रभाव से विकसित होते हैं, तब वे रस का रूप धारण करते हैं। इसलिए Ras in Hindi के अध्ययन में विभाव को रस-निष्पत्ति का प्रमुख कारण माना गया है।

3. रस का अनुभाव

जब किसी व्यक्ति के हृदय में कोई भाव जागृत होता है, तो उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न शारीरिक, मानसिक अथवा व्यवहारिक चेष्टाओं के माध्यम से होती है। भावों की इसी बाह्य अभिव्यक्ति को अनुभाव कहा जाता है। विभाव के पश्चात उत्पन्न होने वाले ये संकेत इस बात का प्रमाण होते हैं कि व्यक्ति के भीतर कोई भाव सक्रिय है।

अनुभाव के भेद

आचार्यों ने अनुभावों को मुख्य रूप से चार वर्गों में विभाजित किया है—

1. कायिक अनुभाव

शरीर की विभिन्न चेष्टाओं एवं गतिविधियों के माध्यम से प्रकट होने वाले भाव कायिक अनुभाव कहलाते हैं।

उदाहरण: मुस्कुराना, हाथ उठाना, नेत्रों का फैलना आदि।

2. मानसिक अनुभाव

मन में उत्पन्न हर्ष, विषाद, चिंता, उत्साह या अन्य भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को मानसिक अनुभाव कहा जाता है।

3. आहार्य अनुभाव

भावों के अनुरूप किए गए कृत्रिम श्रृंगार, वेशभूषा, सजावट और रूप-सज्जा को आहार्य अनुभाव कहते हैं।

4. सात्त्विक अनुभाव

जब कोई भाव अत्यधिक तीव्र होकर व्यक्ति के प्राणों और अंतःकरण को प्रभावित करता है, तब उससे उत्पन्न स्वाभाविक प्रतिक्रियाएँ सात्त्विक अनुभाव कहलाती हैं। ये बिना किसी प्रयास के स्वतः प्रकट होती हैं।

आठ प्रमुख सात्त्विक अनुभाव

सात्त्विक अनुभावों की संख्या आठ मानी गई है—

  1. स्तंभ (स्तब्ध हो जाना)
  2. स्वेद (पसीना आना)
  3. रोमांच (रोंगटे खड़े होना)
  4. स्वरभंग (स्वर में परिवर्तन)
  5. कम्प (कंपन)
  6. विवर्णता (रंग बदल जाना)
  7. अश्रु (आँसू आना)
  8. प्रलय (मूर्छा या चेतना का लोप)

रस-निष्पत्ति में अनुभाव का महत्व

अनुभाव यह संकेत देते हैं कि आश्रय के हृदय में कौन-सा भाव जागृत हुआ है और वह किस स्तर तक विकसित हो चुका है। इनके माध्यम से पाठक या दर्शक भावों की गहनता को सहज रूप से अनुभव कर पाता है। साथ ही, अनुभावों का प्रभावशाली चित्रण काव्य और नाट्य रचना को अधिक सजीव, मार्मिक और आकर्षक बनाता है। इसलिए Ras in Hindi के अध्ययन में अनुभाव को रस-निष्पत्ति का अत्यंत महत्वपूर्ण अवयव माना गया है।

4. रस का संचारी भाव (व्यभिचारी भाव)

जो भाव स्थायी भाव के साथ उत्पन्न होकर उसके विकास और पुष्टि में सहायक होते हैं, उन्हें संचारी भाव कहा जाता है। ये भाव स्थायी भाव के साथ निरंतर संचरण करते रहते हैं और उसे अधिक प्रभावशाली एवं रसपूर्ण बनाने का कार्य करते हैं। चूँकि ये भाव स्थायी नहीं होते तथा कुछ समय बाद समाप्त हो जाते हैं, इसलिए इन्हें व्यभिचारी भाव भी कहा जाता है।

संचारी भाव स्वयं रस का रूप धारण नहीं करते, बल्कि स्थायी भाव को रसावस्था तक पहुँचाने में सहयोग प्रदान करते हैं। जब स्थायी भाव पूर्ण रूप से विकसित होकर रस का स्वरूप ग्रहण कर लेता है, तब संचारी भाव उसमें विलीन हो जाते हैं।

भरतमुनि के अनुसार संचारी भाव

भरतमुनि ने संचारी भावों को ऐसे भाव बताया है जो विभिन्न रसों में घूमते हुए उन्हें पुष्ट और परिपक्व बनाते हैं। जिस प्रकार समुद्र में लहरें उठती हैं और अंततः उसी में विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार संचारी भाव स्थायी भाव से उत्पन्न होकर उसी में समाहित हो जाते हैं। यही प्रक्रिया रस की गहनता और प्रभाव को बढ़ाती है।

संचारी भावों के भेद

यद्यपि संचारी भावों की संख्या असीम मानी जाती है, फिर भी काव्यशास्त्र के आचार्यों ने इनके 33 प्रमुख भेद स्वीकार किए हैं।

संचारी भावों की सूची (Ras in Hindi)

पंक्ति 1पंक्ति 2पंक्ति 3पंक्ति 4
निर्वेदआवेगदैन्यश्रम
मदजड़ताउग्रतामोह
विबोधस्वप्नअपस्मारगर्व
मरणआलस्यअमर्षनिद्रा
अवहित्थाउत्सुकताउन्मादशंका
स्मृतिमतिव्याधिसन्त्रास
लज्जाहर्षअसूयाविषाद
धृतिचपलताग्लानिचिन्ता
वितर्क

रस-निष्पत्ति में संचारी भाव का महत्व

रस की उत्पत्ति और विकास में संचारी भावों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये स्थायी भाव को बल प्रदान करते हैं तथा उसे अधिक व्यापक, प्रभावशाली और आस्वादन योग्य बनाते हैं। यद्यपि संचारी भाव अस्थायी होते हैं और अंततः स्थायी भाव में विलीन हो जाते हैं, फिर भी उनकी उपस्थिति रस की अभिव्यक्ति को अधिक सजीव और प्रभावपूर्ण बना देती है।

इस प्रकार Ras in Hindi के अध्ययन में संचारी भावों को स्थायी भाव के सहायक तत्व के रूप में देखा जाता है, जो रस की पूर्णता और सौंदर्य को बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

रस के प्रकार (Ras Ke Bhed)

हिंदी साहित्य और काव्यशास्त्र में मुख्य रूप से निम्नलिखित 11 रसों का वर्णन किया गया है—

  1. श्रृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. रौद्र रस
  4. करुण रस
  5. वीर रस
  6. अद्भुत रस
  7. वीभत्स रस
  8. भयानक रस
  9. शांत रस
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस

Ras in Hindi – सभी रसों का विस्तृत अध्ययन

रसों का विषय अत्यंत व्यापक है और प्रत्येक रस की अपनी अलग विशेषताएँ, स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा उदाहरण होते हैं। इसलिए सभी रसों का विस्तृत वर्णन एक ही पृष्ठ पर करना व्यावहारिक नहीं है।

इसी कारण Ras in Hindi के प्रत्येक भेद को सरल भाषा और उदाहरणों सहित अलग-अलग पृष्ठों पर विस्तार से समझाया गया है। यदि आप किसी विशेष रस के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो संबंधित रस के नाम पर क्लिक करके उसकी संपूर्ण जानकारी पढ़ सकते हैं।

इन लेखों में आपको प्रत्येक रस की परिभाषा, स्थायी भाव, उदाहरण, पहचान तथा परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण जानकारी सरल एवं व्यवस्थित रूप में उपलब्ध होगी।

Ras in Hindi

Ras in Hindi

भारतीय काव्यशास्त्र में परंपरागत रूप से नौ रसों (नवरस) को मान्यता प्राप्त है। इनमें श्रृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स, अद्भुत और शांत रस शामिल हैं। बाद के अनेक आचार्यों ने वात्सल्य रस को दसवें तथा भक्ति रस को ग्यारहवें रस के रूप में स्वीकार किया।

भक्ति रस को स्वतंत्र रस के रूप में स्थापित करने में अनेक विद्वानों का योगदान रहा है। इसी क्रम में विवेक साहनी द्वारा रचित ग्रंथ “भक्ति रस – पहला रस या ग्यारहवाँ रस” में भक्ति रस के महत्व और स्वतंत्र स्वरूप पर विस्तार से विचार प्रस्तुत किए गए हैं।

इस प्रकार आधुनिक हिंदी साहित्य और काव्यशास्त्र में Ras in Hindi की संख्या 11 मानी जाती है। हिंदी के प्रमुख 11 रस निम्नलिखित हैं—

  1. श्रृंगार रस
  2. हास्य रस
  3. रौद्र रस
  4. करुण रस
  5. वीर रस
  6. अद्भुत रस
  7. वीभत्स रस
  8. भयानक रस
  9. शांत रस
  10. वात्सल्य रस
  11. भक्ति रस

Ras in Hindi: 11 रसों की परिभाषा, स्थायी भाव एवं उदाहरण

हिंदी साहित्य में रस का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रस वह तत्व है जो काव्य, नाटक या साहित्यिक रचना को आनंददायक और प्रभावशाली बनाता है। Ras in Hindi के अंतर्गत मुख्य रूप से 11 रसों का वर्णन किया जाता है। प्रत्येक रस का अपना स्थायी भाव और विशिष्ट प्रभाव होता है।

1. श्रृंगार रस (Shringar Ras)

श्रृंगार रस को सभी रसों का राजा अर्थात रसराज कहा जाता है। इसमें नायक-नायिका के प्रेम, सौंदर्य, आकर्षण और मिलन-विरह का वर्णन किया जाता है। इसका स्थायी भाव रति (प्रेम) है।

उदाहरण:

बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
सौंह करै भौंहनि हँसै, दैन कहै नहि जाय।।

2. हास्य रस (Hasya Ras)

जब किसी व्यक्ति की वेशभूषा, वाणी, हाव-भाव या व्यवहार से हँसी और प्रसन्नता उत्पन्न होती है, तब हास्य रस की निष्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव हास है।

उदाहरण:

बुरे समय को देख कर गंजे तू क्यों रोय।
किसी भी हालत में तेरा बाल न बाँका होय।।

3. रौद्र रस (Raudra Ras)

क्रोध और आक्रोश की भावना से उत्पन्न रस को रौद्र रस कहा जाता है। इसका स्थायी भाव क्रोध है।

उदाहरण:

श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे।।

4. करुण रस (Karun Ras)

प्रिय व्यक्ति, वस्तु या संबंध के वियोग, मृत्यु अथवा हानि से उत्पन्न दुःख और वेदना करुण रस कहलाती है। इसका स्थायी भाव शोक है।

उदाहरण:

रही खरकती हाय शूल-सी, पीड़ा उर में दशरथ के।
ग्लानि, त्रास, वेदना-विमण्डित, शाप कथा वे कह न सके।।

5. वीर रस (Veer Ras)

जब किसी कार्य, युद्ध या चुनौती का सामना करने के लिए मन में साहस और उत्साह का भाव उत्पन्न होता है, तब वीर रस की उत्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव उत्साह है।

उदाहरण:

बुंदेले हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

6. अद्भुत रस (Adbhut Ras)

किसी आश्चर्यजनक, विलक्षण या अलौकिक घटना को देखकर मन में उत्पन्न विस्मय अद्भुत रस कहलाता है। इसका स्थायी भाव आश्चर्य (विस्मय) है।

उदाहरण:

देख यशोदा शिशु के मुख में, सकल विश्व की माया।
क्षणभर को वह बनी अचेतन, हिल न सकी कोमल काया।।

7. वीभत्स रस (Veebhats Ras)

घृणित, अरुचिकर या अप्रिय वस्तुओं को देखकर अथवा उनके बारे में सोचकर उत्पन्न घृणा का भाव वीभत्स रस कहलाता है। इसका स्थायी भाव जुगुप्सा (घृणा) है।

उदाहरण:

आँखें निकाल उड़ जाते, क्षण भर उड़ कर आ जाते।
शव जीभ खींचकर कौवे, चुभला-चभला कर खाते।।

8. भयानक रस (Bhayanak Ras)

भय उत्पन्न करने वाले दृश्य, घटनाएँ या परिस्थितियाँ भयानक रस की रचना करती हैं। इसका स्थायी भाव भय है।

उदाहरण:

अखिल यौवन के रंग उभार, हड्डियों के हिलाते कंकाल।
कचों के चिकने काले व्याल, केंचुली, काँस, सिबार।।


9. शांत रस (Shant Ras)

जब मन संसारिक मोह-माया से मुक्त होकर वैराग्य, आध्यात्म और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर होता है, तब शांत रस की उत्पत्ति होती है। इसका स्थायी भाव निर्वेद (वैराग्य) है।

उदाहरण:

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।
सब अँधियारा मिट गया, जब दीपक देख्या माहिं।।

10. वात्सल्य रस (Vatsalya Ras)

माता-पिता का संतान के प्रति तथा बड़ों का बच्चों के प्रति स्नेह और ममता वात्सल्य रस कहलाता है। इसका स्थायी भाव वत्सलता है।

उदाहरण:

बाल दसा सुख निरखि जसोदा, पुनि पुनि नन्द बुलवाति।
अंचरा-तर लै ढाँकी सूर, प्रभु कौ दूध पियावति।।

11. भक्ति रस (Bhakti Ras)

ईश्वर के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण की भावना भक्ति रस कहलाती है। इसका स्थायी भाव देवविषयक रति (भक्ति) है।

उदाहरण:

अँसुवन जल सिंची-सिंची प्रेम-बेलि बोई।
मीरा की लगन लागी, होनी हो सो होई।।

FAQs – Ras in Hindi

रस किसे कहते हैं?

काव्य, नाटक या साहित्य को पढ़ने, सुनने अथवा देखने से जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है, उसे रस कहा जाता है। रस को काव्य की आत्मा माना गया है।

रस की परिभाषा क्या है?

श्रव्य काव्य के पठन-श्रवण तथा दृश्य काव्य के दर्शन से जो सौंदर्यपूर्ण और आनंदमयी अनुभूति प्राप्त होती है, वही रस कहलाती है।

हिंदी में मूल रस कितने हैं?

हिंदी साहित्य में मूल रूप से 9 रस (नवरस) माने गए हैं— श्रृंगार, हास्य, रौद्र, करुण, वीर, अद्भुत, वीभत्स, भयानक और शांत रस।

रस के कुल कितने भेद हैं?

आधुनिक हिंदी काव्यशास्त्र में रसों के कुल 11 भेद माने जाते हैं, जिनमें वात्सल्य रस और भक्ति रस को भी शामिल किया गया है।

नवरस किसे कहते हैं?

नवरस उन नौ प्रमुख रसों का समूह है जिनका वर्णन प्राचीन भारतीय काव्यशास्त्र में किया गया है।

रस का सबसे महत्वपूर्ण तत्व कौन-सा है?

स्थायी भाव रस का आधार माना जाता है। स्थायी भाव के बिना रस की निष्पत्ति संभव नहीं होती।

श्रृंगार रस का स्थायी भाव क्या है?

श्रृंगार रस का स्थायी भाव रति (प्रेम) है।

वीर रस का स्थायी भाव क्या है?

वीर रस का स्थायी भाव उत्साह है।

शांत रस का स्थायी भाव क्या है?

शांत रस का स्थायी भाव निर्वेद (वैराग्य) है।

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